हिमाचल आपदा राहत: बेघर पीड़ितों को जमीन देने में अड़चनें बरकरार, जयराम के बाद सुक्खू सरकार भी लाचार
Himachal News: हिमाचल प्रदेश में 2023 की विनाशकारी आपदा ने हजारों लोगों को बेघर कर दिया। सरकार ने पीड़ितों को घर बनाने के लिए दो बिस्वा जमीन देने का वादा किया था, लेकिन यह योजना फाइलों में अटकी है। इंडियन फॉरेस्ट एक्ट 1952 के तहत प्रदेश की अधिकांश बंजर और वन भूमि केंद्र सरकार के अधीन है। इस कारण हिमाचल आपदा राहत में देरी हो रही है। पीड़ित परिवार बेसब्री से मदद का इंतजार कर रहे हैं।
1952 की अधिसूचना बनी चुनौती
1952 में जारी अधिसूचना के मुताबिक, हिमाचल में वन भूमि के साथ-साथ बंजर जमीन भी वन भूमि मानी जाती है। यह नियम इंडियन फॉरेस्ट एक्ट 1927 के तहत लागू हुआ था। इसके चलते सरकार के पास उपलब्ध जमीन सीमित है। विकास परियोजनाओं और सामाजिक योजनाओं के लिए भी केंद्र सरकार से मंजूरी लेनी पड़ती है। आपदा पीड़ितों को जमीन देने की प्रक्रिया में यह अधिसूचना सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है।
वन संरक्षण कानून ने बढ़ाई मुश्किलें
1980 में लागू वन संरक्षण कानून ने हिमाचल आपदा राहत की राह को और जटिल कर दिया। इस कानून के तहत वन भूमि का उपयोग किसी भी परियोजना या योजना के लिए बिना केंद्र की अनुमति के नहीं हो सकता। कई बार मंजूरी में देरी से विकास कार्य और सामाजिक योजनाएं अटक जाती हैं। विधायक प्राथमिकता की कई परियोजनाएं भी इस कारण लंबित हैं। पीड़ितों को जमीन देने का वादा अभी तक पूरा नहीं हो सका।
सरकार की पहल और कानूनी राय
राजस्व मंत्री जगत सिंह नेगी ने कहा कि सरकार 1952 की अधिसूचना पर कानूनविदों से राय लेगी। इसके लिए एक उप-समिति बनाई गई है, जो इस मुद्दे पर गहन अध्ययन कर रही है। समिति की रिपोर्ट के आधार पर सरकार कानूनी समाधान तलाशेगी। आपदा पीड़ितों के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में तीन बिस्वा और शहरी क्षेत्रों में दो बिस्वा जमीन देने की घोषणा पहले भी की जा चुकी है, लेकिन कार्यान्वयन में बाधाएं बरकरार हैं।
पीड़ितों का इंतजार और सरकार की चुनौतियां
हिमाचल प्रदेश पिछले तीन सालों से लगातार आपदाओं का सामना कर रहा है। 2023 की आपदा में हजारों घर तबाह हुए। पूर्व जयराम ठाकुर सरकार ने भी बेघर परिवारों को जमीन देने का वादा किया था, लेकिन यह अधिसूचना रास्ते में रोड़ा बनी। वर्तमान कांग्रेस सरकार भी इस समस्या से जूझ रही है। पीड़ित परिवारों की उम्मीदें अब सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं, जो केंद्र सरकार की मंजूरी पर निर्भर करता है।
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